
Gita Acharan
bySiva Prasad
ReligionSpirituality
Bhagavad Gita is a conversation between Lord Krishna and Warrior Arjun. The Gita is Lord's guidance to humanity to be joyful and attain moksha (salvation) which is the ultimate freedom from all the polarities of the physical world. He shows many paths which can be adopted based on one's nature and conditioning. This podcast is an attempt to interpret the Gita using the context of present times. Siva Prasad is an Indian Administrative Service (IAS) officer. This podcast is the result of understanding the Gita by observing self and lives of people for more than 25 years, being in public life.
Episodes(40 episodes)
236. त्यागी
श्रीकृष्ण त्यागी को परिभाषित करते हुए कहते हैं “जो लोग न तो अकुशल(अप्रिय या दुःख रूप) कर्म से बचते हैं और न ही कुशल (सुखद या कल्याणकारी) कर्म में आसक्त होते हैं, वे त्यागी हैं। सात्विक गुणों से संपन्न और मेधावी होने के कारण वे संशय रहित होते है” (18.10)।हम सभी कुशल कर्मों को करने के लिए प्रेरित होते हैं और अकुशल कर्मों से बचते हैं। हम ऐसे कर्म करते हैं जो स्वयं की, परिवार, संगठन या समाज की भलाई के लिए होते हैं। हालाँकि यह तर्कसंगत लगता है लेकिन यह कर्मों के अकुशल और कुशल के रूप में विभाजन का परिणाम है। त्यागी वह है जिसके लिए यह आंतरिक विभाजन खत्म हो जाता है। श्रीकृष्ण उन्हें मेधावी कहते हैं जो आंतरिक विभाजन को छोड़ देते हैं। जब विभाजन के अंत से एकता आती है तो उनके संदेह भी समाप्त हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, त्यागी न तो किसी कर्म से घृणा करता है और न ही उससे आसक्त होता है।श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “देहधारी जीवों के लिए पूर्ण रूप से कर्मों का परित्याग करना असम्भव है लेकिन जो कर्मफलों का परित्याग करते हैं, वे वास्तव में त्यागी कहलाते हैं (18.11)। कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा, बुरा और मिश्रित, ऐसे तीन प्रकार के फल मरने के पश्चात् अवश्य होते हैं; किंतु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल न तो इस लोक में और न परलोक में भोगना पड़ता है” (18.12)।अस्तित्व का मूल सत्य यह है कि देहधारी प्राणी कर्मों का त्याग नहीं कर सकते क्योंकि हमारा अस्तित्व ही भोजन करने और श्वास लेने जैसी कई गतिविधियों पर निर्भर करता है। श्रीकृष्ण कर्मफल के त्याग का मार्ग बताते हैं और इस उपदेश को उन्होंने अनेक अवसरों पर दोहराया भी है। यदि कोई कर्मफल से अपने आप को नहीं अलग करता तो क्या होता है? श्रीकृष्ण कहते हैं फल की आकांक्षा रखने वालों को तीन प्रकार के कर्मफलप्राप्त होते हैं; किंतु त्यागी को नहीं। हमारा आसक्ति भाव ही किसी कर्मफल को सुखद या दुःखद बनाता है। त्यागी वह है जो इस आसक्ति को छोड़ देता है और द्वैतों से ऊपर उठकर द्वन्द्वातीत (जो द्वन्द्वों से परे हो गया है) बन जाता है।
Published: Jul 24, 2026Duration: 3m 50s
Season 3 - Episode 235
235. नियत कर्म
भगवद्गीता में कुछ सूत्र ऐसे हैं जो समझने में तो सरल हैं, पर उन्हें जीवन में उतारना अत्यन्त कठिन है। दूसरी ओर, कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें समझ पाना ही चुनौतीपूर्ण है। ऐसा ही एक विषय है -‘नियत कर्म’ (निर्धारित या अनिवार्य कार्य)। यह प्रश्न सदा से मनुष्य को उलझन में डालता रहा है कि हमारे नियत या अनिवार्य कर्तव्य क्या हैं, किन बातों को सहना चाहिए और किन्हें नहीं। विभिन्न ज्ञानी महापुरुषों के ग्रंथों और उपदेशों में इस विषय पर भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ मिलती हैं जो बाहर से देखने पर परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होती हैं। स्वयं हमारी समझ भी उम्र और अनुभव के साथ बदलती रहती है।भूख लगने पर भोजन करना और प्यास लगने पर पानी पीना, ये प्राकृतिक नियत कर्म हैं। किंतु जीवन इतना सरल नहीं है; यह अनेक जटिल परिस्थितियाँ हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है। इसलिए श्रीकृष्ण ने पहले ही कहाथा कि यह विषय अत्यन्त सूक्ष्म और जटिल है और यहाँ तक कि ज्ञानीजन भी कर्म और अकर्म (अक्रियता या निष्क्रियता) की सूक्ष्मताओं से भ्रमित हो जाते हैं (4.16)। वे आगे कहते हैं कि कर्म का स्वरूप समझना अत्यन्त कठिन है। अतः नियत या उचित कर्म को भली-भांति समझने के लिए विकर्म (निषिद्ध कर्म) और अकर्म, इन दोनों के स्वरूप को भी जानना आवश्यक है (4.17)।त्याग (संन्यास) और नियत कर्म के संदर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं “नियत कर्म का कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए। मोहवश किया गया ऐसा त्याग तामसिककहा गया है” (18.7)। जो व्यक्ति शारीरिक कष्ट के भय से दुःखदायक कर्म का परित्याग करता है, वह राजसिक त्याग करता है; ऐसा त्याग न तो लाभदायक होता है और न ही आध्यात्मिक रूप से उन्नति देने वाला” (18.8)। जो व्यक्ति आसक्ति और फल की इच्छा का त्याग करके नियत कर्म करता है, उसका त्याग सात्विक त्याग कहा जाता है” (18.9)।इस संदर्भ में श्रीकृष्ण ने पहले कहा कि कुछ योगी देवताओं के लिए यज्ञकरते हैं; अन्य लोग ब्रह्म (परमात्मा) की अग्नि में आहुति देकर बलिदान को ही बलिदान करते हैं। मूलतः यह मन से त्याग के भाव का भी त्याग करना है। यह गुणातीत अवस्था है जो गुणों से परे हो गया है।
Published: Jul 24, 2026Duration: 3m 46s
Season 4 - Episode 234
234. आसक्ति का त्याग
त्याग के विषय में चार प्रकार के मतों या विचारधाराओं का विस्तार से वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण कहते हैं “अब त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुनो। त्याग तीन प्रकार के होते हैं” (18.4)। आगे के श्लोकों में वे स्पष्ट करते हैं कि त्याग भी तीन प्रकार का होता है -सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “यज्ञ, दान, तथा तपस्या पर आधारित कर्मों का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए। इन्हें निश्चित रूप से सम्पन्न करना चाहिए। यज्ञ,दान तथा तपस्या वास्तव में महात्माओं (विद्वानों) को भी शुद्ध करते हैं (18.5)। ये सब कार्य आसक्ति और फल की कामना से रहित होकर संपन्न करने चाहिए। यह मेरा स्पष्ट और अंतिम निर्णय है” (18.6)।अज्ञानता के स्तर पर मनुष्य भौतिक वस्तुएँ, शक्ति, प्रसिद्धि और प्रभाव एकत्रित करता रहता है। त्याग उसका अगला चरण है। कोई इसे लेन-देन के रूप में देख सकता है -जैसे प्रसिद्धि पाने या पुण्य अर्जित करने के लिए दान देना आदि। कभी-कभी त्याग निराशा की अवस्था में भी होता है जैसे अर्जुन का कुरुक्षेत्र के युद्ध को त्यागने का विचार। हम सभी अपने जीवन में ऐसे द्वन्द्वों से गुजरते हैं, इसलिए भगवद्गीता में त्याग और संन्यास के विषय में विस्तार से कहा गया है।श्रीकृष्ण ने कई अवसरों पर संन्यास के विषय में कहा है। उन्होंने बताया कि केवल संन्यास करने मात्र से सिद्धि (परिपूर्णता) प्राप्त नहीं होती (3.4); मनुष्यको सदैव नित्य संन्यासी होना चाहिए अर्थात् वह जो न तो घृणा करता है और न ही इच्छा करता है; जो द्वन्द्वों से मुक्त (द्वन्द्वातीत) है और जो सहज ही सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है (5.3); वही संन्यासी और योगी है जो अपने नियत कर्म को बिना कर्मफल पर निर्भर हुए करता है न कि वह जो केवल कर्मों का त्याग करता है (6.1)।ये शिक्षाएँ यहाँ पुनः प्रतिध्वनित होती हैं जब श्रीकृष्ण कहते हैं यज्ञ, दान और तप जैसे कर्मों का पालन आसक्ति रहित होकर किया जाना चाहिए। वे यहाँ भौतिक वस्तुओं से होने वाले मानसिक बंधनों की ओर संकेत कर रहे हैं। इसी प्रकार कर्मफल की अपेक्षा किए बिना कर्म करना भगवद्गीता की एक अन्य मूल शिक्षा है।
Published: Jul 24, 2026Duration: 3m 46s
Season 4 - Episode 233
233. त्याग के चार मार्ग
भगवद्गीता में अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक हैं। अठारहवाँ अध्याय ‘मोक्ष संन्यास योग’ कहलाता है -अर्थात् संन्यास या त्याग के माध्यम से मुक्ति का योग। यह संन्यास या त्याग के मार्ग के द्वारा गंतव्य तक पहुँचना है जो कि मोक्ष या मुक्ति है। यह मुक्ति हमारी विभाजनकारी दृष्टिकोण से मुक्ति है; यह आस्थाओं या मान्यताओं से मुक्ति है; और अंततः, स्वयं त्याग से भी मुक्ति है। यह अध्याय अर्जुन के प्रश्न से शुरू होता है “हे हृषीकेश, मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को और उनके बीच के भेद को स्पष्ट रूप से जानना चाहता हूँ” (18.1)। श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं “कामना से अभिप्रेरित कर्मों के परित्याग को विद्वान् लोग ‘संन्यास’ कहते हैं और सभी कर्मों के फलों के त्याग को बुद्धिमान् लोग त्याग कहते है (18.2)। कुछ मनीषी घोषित करते हैं कि समस्त प्रकार के कर्मों को दोषपूर्ण मानते हुए उन्हें त्याग देना चाहिए किंतु अन्य विद्वान् यह आग्रह करते हैं कि यज्ञ, दान, तथा तपस्या जैसे कर्मों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए” (18.3)। श्रीकृष्ण ‘संन्यास’ और ‘त्याग’ शब्दों को परस्पर एक रूप में प्रयोगकरते हैं जिससे यह संकेत मिलता है कि ये दोनों त्याग या वैराग्य के लिए प्रयुक्त दो भिन्न नाम हैं।श्रीकृष्ण हमें त्याग के विषय में प्रचलित चार विचारधाराओं से अवगत कराते हैं। संयोगवश, सभी मत और विश्वास-प्रणालियाँ मूल रूप से इन्हीं विचारधाराओं में से किसी एक पर आधारित हैं। पहले मत के अनुसार त्याग का अर्थ है सभी इच्छा से प्रेरित कर्मों का त्याग करना अर्थात् कर्म करते समय प्रेरणा या स्वार्थ की अनुपस्थिति। दूसरी विचारधारा के अनुसार त्याग का अर्थहै किसी भी कर्म को करते समय कर्म के फल का त्याग करना।तीसरा मत यह कहता है कि सभी कर्म कलुषित (अपवित्र) हैं, अतःउनका पूर्ण परित्याग करना चाहिए। यह दृष्टिकोण ‘कर्तापन’ की भावना को त्यागने की बात करता है और ‘अस्तित्व’ या ‘परमात्मा’ को समस्त कर्मों के कर्ता के रूप में मानता है। अंततः, चौथा मत यह कहता है कि कर्मों के प्रति चयनशील होना चाहिए -यज्ञ, दान और तप जैसे कर्मों का परित्याग नहीं किया जाना चाहिए।चाहे कोई भी मत या विचारधारा क्यों न हो, किसी न किसी रूप में ये सभी मार्ग एक ही गंतव्य -मोक्ष की ओर ले जाते हैं।
Published: Jul 24, 2026Duration: 4m 3s
Season 4 - Episode 232
232. शुभ कर्म
श्रीकृष्ण कहते हैं ‘ॐ तत् सत्’ -यह तीन शब्द परम सत्य, ब्रह्म के त्रिविध प्रतीक हैं। वे आगे ‘सत्’ शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहते हैं “ ‘सत्’ शब्द का अर्थ शाश्वत सत्य और शुभ है। हे अर्जुन! यह शब्द शुभ कर्मों को वर्णित करने के लिए भी प्रयुक्त होता है। जो व्यक्ति यज्ञ, तप और दान में निष्ठापूर्वक स्थित होता है, उसे भी ‘सत्’ कहा जाता है। और इस प्रकार जो भी कर्म इन उद्देश्यों के लिए किया जाता है, वह ‘सत्’ कहलाता है (17.26-27)। परंतु यज्ञ, दान या तप जैसे कर्म यदि श्रद्धा के बिना किया जाता है, वह ‘असत्’ कहलाता है।ऐसे कर्म न इस लोक के लिए उपयोगी होते हैं, न ही परलोक के लिए” (17.28)।श्रीकृष्ण ने ‘सत्’ और ‘असत्’ का वर्णन भगवद्गीता के प्रारम्भ में ही किया था। उन्होंने कहा कि सत् (सत्य / वास्तविक) कभी नष्ट नहीं होता और असत् (अवास्तविक / मिथ्या) का कोई अस्तित्व नहीं होता। इन दोनों के स्वरूप को केवल ज्ञानी पुरुष ही भली-भांति पहचान सकते है (2.16)।‘असत्’ वह है -‘जो न तो अतीत में था और न ही भविष्य में रहेगा’। उदाहरणके लिए इन्द्रिय-सुख, भावनाएँ या भौतिक वस्तुएँ -ये न पहले थीं, न आगे रहेंगी; अतः ये असत् हैं। दूसरे, रस्सी-साँप का उदाहरण यह समझाने के लिए दिया जाता है कि ‘असत्’ का अस्तित्व ‘सत्’ पर निर्भर करता है जैसे रस्सी के बिना साँप का भ्रम भी नहीं होता। एक अन्य उदाहरण दर्पण में दिखाई देने वाला प्रतिबिंब है। जब हम दर्पण के सामने खड़े होते हैं तो उसमें हमारी छवि दिखाई देती है। यह प्रतिबिंब हमारे बिना स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं रह सकता। हम ‘सत्’ हैं -अर्थात् मूल और वास्तविक सत्ता -जबकि दर्पण में दिखाई देने वाली छवि ‘असत्’ है जिसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।श्रीकृष्ण यहाँ एक और मार्ग प्रस्तुत करते हैं जब वे कहते हैं कि जो भी कर्म जैसे यज्ञ, दान या तप, श्रद्धा के बिना किया जाता है, वह ‘असत्’ कहलाता है। अर्थात् ‘सत् कर्म’ करने के लिए श्रद्धा सबसे आवश्यक तत्व है। यह मार्ग एक और व्याख्या प्रस्तुत करता है।श्रद्धा का अर्थ है अविचल भक्ति जहाँ किसी भी कर्म का परिणाम परमात्माका आशीर्वाद मानकर स्वीकार किया जाता है। दूसरे शब्दों में, यह कर्मफल की अपेक्षा किए बिना कर्म करना है (2.47)। यह हमारे द्वारा किए गए किसी भी कर्म में कर्तापन की भावना का त्याग करने से भी प्राप्त होता है। जब कर्तापन और कर्मफल की इच्छा, दोनों का त्याग कर दिया जाता है तब प्रत्येक कर्म शुभ बन जाता है। इसलिए श्रीकृष्ण उसे ‘शुभ कर्म’ कहते हैं।
Published: Jul 9, 2026Duration: 4m 31s
Season 4 - Episode 231
231. ॐ तत् सत्
भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय का शीर्षक ‘श्रद्धा त्रय विभाग योग’ है जिसमें श्रीकृष्ण जीवन और अस्तित्व के प्रत्येक पक्ष के तीन रूपों की व्याख्या करते हैं और कहते हैं कि ‘ॐ तत् सत्’ -ये तीन शब्द परम सत्य, ब्रह्म का त्रिविध प्रतिनिधित्व माने गए हैं। इसी ब्रह्म से ब्राह्मण ग्रन्थ, वेद और यज्ञ उत्पन्न हुए” (17.23)। ‘ॐ तत् सत्’ वेदान्त के संदर्भ में सर्वाधिक प्रचलित वाक्यांश है।ॐ एक मौलिक ध्वनि या कम्पन है। यह माना जाता है कि सृष्टि की उत्पत्ति इसी दिव्य कम्पन ॐ से हुई और विज्ञान भी यह पुष्टि करता है कि सम्पूर्ण पदार्थ निरन्तर कम्पन की अवस्था में रहता है जिसे आवृत्ति (frequency) कहा जाता हैं। ॐ का यह कम्पन तीन अक्षरों -‘अ-उ-म्’ से मिलकर बना है।‘तत्’ का अर्थ ‘वह’ है। ‘तत्’ की व्याख्या ‘सर्वव्यापी सत्य’ के रूप में भी की जाती है। सामान्यतः परमात्मा को ‘तुम’ कहकर संबोधित करना सहज लगता है। परंतु जब हम परमात्मा को ‘तुम’ कहते हैं तो ‘मैं’ भी बना रहता है। इसी कारण श्रीकृष्ण ने ‘तत्’ शब्द का प्रयोग किया है। ‘तत्’ वह अवस्था है जहाँ‘मैं’ और ‘तुम’ दोनों लीन होकर एक हो जाते हैं जैसे नमक की गुड़िया सागर में विलीन होकर स्वयं सागर बन जाती है। यह अस्तित्व के साथ एकाकारहोने की अवस्था का प्रतीक है। वेदांत में इसी भाव को व्यक्त करने के लिए ‘तत् त्वम् असि’ अर्थात् ‘तुम वही हो’ कहा गया है जो मनुष्य और परमात्मा के बीच एकत्व का बोध कराता है।श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “इसलिए, दान, तप और यज्ञ जैसे शास्त्रों में निर्दिष्ट सभी कर्मों का आरंभ सदा ‘ॐ’ उच्चारण से किया जाता है (17.24)। जो लोग मुक्ति के इच्छुक हैं और फल की इच्छा नहीं रखते, वे ‘तत्’ का चिंतन करते हुए विविध दान, तप और यज्ञ करते हैं” (17.25)।जहाँ इच्छा या कामना करना ही बन्धन का कारण होता है वहीं इस श्लोक में मोक्ष की इच्छा का उल्लेख किया गया है जो देखने में विरोधाभासी प्रतीत होता है। पहला चरण भौतिक वस्तुओं की इच्छा है, दूसरा चरण मोक्ष की इच्छा है और अंतिम चरण मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा का भी त्याग करना है। यह एक क्रमिक विकास यात्रा है जैसे प्राथमिक शिक्षा से लेकर स्नातकोत्तर तक की प्रगति। श्रीकृष्ण हमें इस धीरे-धीरे होने वाले आंतरिक परिवर्तन में मार्गदर्शन करते हैं।
Published: Jul 3, 2026Duration: 4m 15s
Season 4 - Episode 230
230. दान के प्रकार
गुणों के संदर्भ में यज्ञ और तप का वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण दान के बारे में कहते हैं “जो दान केवल कर्तव्य समझकर, बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के, उचित समय और स्थान पर, किसी योग्य व्यक्ति को दिया जाता है, वह सात्विक माना जाता है” (17.20)। इस श्लोक में दान के लिए कई प्रकार के निर्देश या नियम निहित हैं।श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि योग न तो उस व्यक्ति के लिए है जो बहुत अधिक खाता है और न ही उस व्यक्ति के लिए जो बिल्कुल नहीं खाता; न ही उसके लिए जो अधिक सोता है और न ही उसके लिए जो हमेशा जागता रहता है (6.16)। इसका अर्थ है परिस्थितियों के अनुसार संतुलित और उचित आचरण करना। बीमारी के समय व्यक्ति का भोजन कम हो जाता है जबकि शारीरिक परिश्रम के बाद भोजन की मात्रा बढ़ जाती है। यह दर्शाता है कि उपयुक्तता समय और स्थान पर निर्भर करती है। अतः इस श्लोक का तात्पर्य है कि उचित आचरण का अर्थ है परिस्थितियों के अनुसार सहज रूप से ढल जाना और प्रवाह के साथ चलना।दान की उपयुक्तता उस व्यक्ति के संदर्भ में भी होती है जिसे दान दिया जा रहा है। यह उसी प्रकार है जैसे परमाणु तकनीक जैसे दोहरे उपयोग (dual-use) वाली तकनीकें रखने वाले देश, उन देशों को यह तकनीक नहीं देते जोउसका दुरुपयोग कर सकते हैं। इसी प्रकार प्राचीन समय में गुरु तब तक किसी शक्तिशाली तंत्र या साधना की शिक्षा नहीं देते थे जब तक उन्हें यह विश्वास न हो जाए कि शिष्य उसका उपयोग समाज के कल्याण के लिए करेगा।‘कर्तव्य के रूप में दान’ एक जटिल विषय है क्योंकि यह प्रश्न उठाता है कि क्या कर्तव्य है और क्या नहीं। उदाहरण के लिए बीजावरण का कर्तव्य बीज की रक्षा करना है और बाद में स्वयं नष्ट होकर अंकुर को बाहर आने देना। इस प्रकार कर्तव्य के स्वभाव को समझना कोई सरल कार्य नहीं है।श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “जो दान अनिच्छा से, प्रत्युपकार की आशा में या किसी फल की अपेक्षा से दिया जाता है, वह राजसिक दान कहलाता है” (17.21)। “जो दान अनुचित स्थान और समय पर, अयोग्य व्यक्तियों को, बिना सम्मान के या तिरस्कारपूर्वक दिया जाता है, वह तामसिक दान कहा गया है” (17.22)।
Published: Jul 1, 2026Duration: 4m 0s
Season 4 - Episode 229
229. तप के प्रकार
तप के प्रकार
Published: Jun 26, 2026Duration: 4m 18s
Season 4 - Episode 228
228. यज्ञ के प्रकार
यज्ञ के प्रकार
Published: Jun 26, 2026Duration: 4m 5s
Season 4 - Episode 227
227. मन और उदर का संबंध
मन और उदर का संबंध
Published: Jun 26, 2026Duration: 3m 34s
Season 4 - Episode 226
226. गुण और श्रद्धा
गुण और श्रद्धा
Published: Jun 26, 2026Duration: 3m 49s
Season 4 - Episode 225
225. शास्त्र एवं स्वधर्म
शास्त्र एवं स्वधर्म
Published: Jun 26, 2026Duration: 3m 27s
Season 4 - Episode 224
224. नरक के तीन द्वार
नरक के तीन द्वार
Published: Jun 26, 2026Duration: 3m 48s
Season 4 - Episode 223
223. बुराई का फल बुरा ही होता है
श्रीकृष्ण आसुरी प्रवृत्ति वालों का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं,"ऐसे अनेक प्रकार से भ्रमित मन वाले, मोह के जाल में उलझकर तथा विषय-भोगों में आसक्त होकर घोर नरक में गिरते हैं (16.16)। ऐसे अभिमानी और हठी लोग, संपत्ति के मद और अहंकार से मदमस्त होकर, शास्त्रों के विधि-विधानों का आदर न करते हुए पाखंडपूर्वक केवल नाम मात्र के लिए यज्ञ करते हैं (16.17)। अहंकार (मैं कर्ता हूँ), बल, दम्भ, कामना और क्रोध से अंधे होकर, ये द्वेषी पुरुष अपने भीतर तथा अन्य सभी प्राणियों में निवास करने वाले मुझ अन्तर्यामी को तुच्छ समझते हैं (16.18)। इन द्वेष करनेवाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में डालता हूँ (16.19)। ये अज्ञानी आत्माएँ आसुरी योनियों में बार-बार जन्म लेती हैं। हे अर्जुन, वे मूढ़ मुझे प्राप्त न कर पाने पर, धीरे-धीरे आसुरी योनियों को और उससे भी अति अधम गति को ही प्राप्त होते हैं" (16.20)।श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि वे सभी जीवों के प्रति समान भाव रखते हैं। उनके लिए न तो कोई द्वेष्य है और न ही कोई प्रिय है (9.29)। लेकिन उपरोक्त श्लोक संकेत करते हैं कि वे आसुरी प्रवृत्ति वालों से घृणा करते हैं और इसलिए उन्हें अधम योनियों में रखते हैं।यह प्रत्यक्ष विरोधाभास हमारे इस भ्रम से उत्पन्न होता है कि श्रीकृष्ण (परमात्माका नाम व्यक्ति की आस्था के आधार पर भिन्न हो सकता है) एक व्यक्ति हैं, जबकि वे वास्तव में स्वयं अस्तित्व हैं। वे केवल उन नियमों कावर्णन कर रहे हैं जो अस्तित्व को संचालित करते हैं। यह गुरुत्वाकर्षण के नियम की तरह है जहाँ ऊँचाई से कूदने पर गिरना अनिवार्य है। श्रीकृष्ण ने पहले इसका वर्णन इस प्रकार किया था, "व्यक्ति जिस भी प्रकार से मुझे भजते हैं, मैं उसी प्रकार से उन्हें प्राप्त होता हूँ" (4.11)। जब कोई आसुरी मार्ग अपनाता है, तो सम्भवतः समय के साथ, अस्तित्व स्वतः ही आसुरी ढंग से प्रतिक्रिया करता है।हमारा भौतिक शरीर विकास, उत्कृष्ट शिल्पकला और सुसंगति के संदर्भ में अस्तित्व की अनन्त उदारता का सर्वोत्तम उदाहरण है। यह हमें जो कुछ भी दिया गया है, उसके लिए कृतज्ञ होने के बारे में है, न कि इंद्रिय तृप्ति के लिए अस्तित्व से कुछ हड़पने के लिए।
Published: May 9, 2026Duration: 3m 57s
Season 4 - Episode 222
222. शक्ति का दर्प सही नहीं
श्रीकृष्ण कहते हैं कि आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति सोचता है, “मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस इच्छा को पूरा करूँगा। यह सब मेरा है और कल मुझे इससे भी अधिक मिलेगा (16.13)। मैंने इस शत्रु को मार डाला है और अन्य शत्रुओं को भी मार डालूँगा। मैं मनुष्यों में शासक हूँ; मैं भोगी हूँ, मैं पूर्ण, शक्तिशाली और सुखी हूँ (16.14)। मैं धनवान और कुलीन हूँ; मेरे समान और कौन है? मैं त्याग करूँगा, मैं दान करूँगा, मैं आनंद मनाऊँगा।" इस प्रकार, आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति अज्ञानता से मोहित हो जाते हैं (16.15)। आज की दुनिया में, इसे अक्सर 'सफलता' समझ लिया जाता है।यह अहंकार की भाषा है जो दूसरों से तुलना करने से पनपती है। आसुरी व्यक्ति अहंकार से ग्रसित होता है, जो दूसरों की तुलना में अधिक धन अर्जित करने में सफलता मिलने पर, शत्रुओं के परास्त होने पर, या उन्नति के शिखर पर पहुँचने पर शासक जैसा अनुभव करता है। ऐसा होने पर अहंकार में वृद्धि होती है।तुलना इच्छाओं को प्रेरित करती है, जिसमें संचय और इंद्रिय तृप्ति की इच्छा भी शामिल हैं। लेकिन इंद्रिय तृप्ति का कोई अंत नहीं है और श्रीकृष्ण इसे अज्ञानजनित मोह कहते हैं। श्रीकृष्ण ने अज्ञान का नाश करने के लिए ज्ञान की तलवार का उपयोग करने के लिए कहा था (4.41) और कहा था कि इस संसार में ज्ञान से अधिक पवित्र कुछ भी नहीं है। समय आने पर, जिसने योग सिद्ध कर लिया है, वह इसे स्वयं में पा लेता है (4.38)। इसकी कुंजी है सबूरी (धैर्य) के साथ श्रद्धा।हमारी वर्तमान स्थिति चाहे जो भी हो, ज्ञान योग के अभ्यास से हम उपयुक्त समय में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। सार यह है कि जब हम तुलना करते हैं तो स्वयं का अवलोकन करें; एक अच्छे विद्यार्थी की तरह इन प्रवृत्तियों पर प्रश्न करें (4.34), ताकि हम स्वयं को बेहतर बना सकें। श्रीकृष्ण ने पहले आश्वासन दिया था कि योग के अभ्यास में छोटे कदम भी परिणाम देते हैं (2.40)।
Published: Apr 29, 2026Duration: 3m 40s
Season 4 - Episode 221
221. साधन और साध्य - दोनों शुद्ध हों
श्रीकृष्ण आसुरी स्वभाव वालों के बारे में आगे कहते हैं, "यह मानते हुए कि यह सारा संसार शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए है, ऐसे लोग मृत्युपर्यंत सांसारिक चिंताओं में डूबे रहते हैं (16.11)। सैकड़ों इच्छाओं, काम और क्रोध के बन्धन में बंधे हुए, वे अपनी इंद्रियों की तृप्ति के लिए अन्यायपूर्ण तरीकों से धन संचय करने का प्रयास करते हैं" (16.12)। जब इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, तो क्रोध स्वाभाविक है, इस प्रकार वे साथ-साथ चलते हैं। इसीलिए इंद्रियों पर नियंत्रण भगवद्गीता के प्रमुख उपदेशों में से एक है।जब कोई संचय को लक्ष्य बनाता है, तो उसकी प्रवृत्ति उसे प्राप्त करने की ओर अपनी सारी ऊर्जा लगाने की होती है। इस मार्ग पर, व्यक्ति उक्त लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनाए गए सभी साधनों को उचित ठहराने की कोशिश करता है, चाहे वे साधन नैतिक हों या अनैतिक। इस प्रक्रिया में दूसरों को हड़पना शामिल है - यह संपत्ति या अच्छे काम का श्रेय हो सकता है; यह बाजार में हिस्सेदारी हड़पना या मन में जगह बनाना हो सकता है जिसे स्वार्थी उद्देश्यों के लिए 'दूसरों को प्रभावित करना' कहा जाता है जैसा कि सामाजिक संचार माध्यम (सोशल मीडिया) पर किया जाता है। श्रीकृष्ण जमाखोरी को हतोत्साहित करते हैं और जमा करने वालों को चोर कहते हैं (3.12)। वह हमें देने और लेने के प्राकृतिक चक्र का हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। उन्होंने जल चक्र का उदाहरण दिया जिसमें वर्षा और वाष्पीकरण के निःस्वार्थ कर्म (यज्ञ) शामिल हैं।इसका मतलब अपने पेशे या कर्मों का त्याग करना नहीं है। श्रीकृष्ण ने पहले हमें कर्मों का त्याग करने के लिए नहीं, बल्कि घृणा का त्याग करने के लिए कहा था। एक बार घृणा का त्याग हो जाए, तो उसका ध्रुवीय विपरीत, यानी आसक्ति या हड़पना, स्वतः ही गायब हो जाएगा।विकास और सुधार प्रकृति का अभिन्न अंग हैं। इस प्रक्रिया में, बेहतर प्रजातियाँ विकसित होती हैं; जीवन की गुणवत्ता समय के साथ बेहतर होती जाती है। सार यह है कि संचय में लिप्त होने के बजाय प्रवाह के साथ आगे बढ़ें। संचय के प्रति यह आसक्ति ही वह बन्धन है जिसे श्रीकृष्ण ने आसुरी व्यक्ति की पहचान बताया है।
Published: Apr 23, 2026Duration: 3m 58s
Season 4 - Episode 220
220. तर्क से परे
तर्क से परे
Published: Apr 23, 2026Duration: 3m 41s
Season 4 - Episode 219
219. बन्धन से मुक्ति
श्रीकृष्ण कहते हैं, “तेज (चरित्र का तेज), क्षमा, धैर्य, पवित्रता, शत्रुभाव का न होना और प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्त होना; ये सब दिव्य प्रवृत्ति से संपन्न लोगों के दैवीय गुण हैं (16.3)। दम्भ, अहंकार, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञानता उस व्यक्ति के लक्षण हैं जो आसुरी प्रवृत्ति के साथ जन्म लेता है (16.4)। संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं- एक वे जो दैवीय गुणों से सम्पन्न हैं और दूसरे वे जो आसुरी प्रवृत्ति के हैं (16.6)। दैवीय प्रकृति मोक्ष प्रदान करती है;जबकि आसुरी गुण निरंतर बन्धन की नियति का कारण होते हैं”(16.5)। चूँकि मुक्ति और बन्धन अनुभवजन्य हैं, इसलिए उनके बारे में कोई भी व्याख्या स्पष्टता प्रदान करने के बजाय भ्रम पैदा करेगी।फँसे हुए बंदर की कहानी हमें बन्धन और मुक्ति के बीच के द्वैत को समझने में मदद करेगी। एक संकरे मुँह वाले सुराही में कुछ मेवे रखे जाते हैं, जिसमें बंदर का हाथ मुश्किल से समा पाता है। बंदर सुराही के मुँह से अपना हाथ अंदर डालता है और मुट्ठी भर मेवे पकड़ लेता है। मुट्ठी भर जाने पर उसका आकार बढ़ जाता है, इसलिए वह सुराही से बाहर नहीं निकल पाता और बंदर सुराही से बंध जाता है। हालाँकि बंदर अपनी बंद मुट्ठी को सुराही से बाहर निकालने के लिए हर सम्भव प्रयास करता है, लेकिन जब तक उसे यह एहसास नहीं हो जाता कि जाल उसने खुद ही बिछाया है, तब तक वह मुक्त नहीं हो सकता।विभाजन और उससे उत्पन्न तुलनाएँ; अतीत में जीना या भविष्य से अपेक्षाएँ; धन, विलासिता, शक्ति, मित्रों, शत्रुओं, काम, शराब या यहाँ तक कि दैनिक दिनचर्या से लगाव, बंदर की मुट्ठी में बंद उन मेवों की तरह हैं जो हमें बाँधते हैं। जहाँ कुछ और बनने या कुछ हड़पने की इच्छा बन्धन है, वहीं स्वयं को विलीन कर अस्तित्व के साथ एकाकार हो जाना मुक्ति है।जीवन हमारे सामने विभिन्न परिस्थितियाँ प्रस्तुत करता है, परंतु जब हम उन्हें उसी प्रकार आत्मसात करना सीख जाते हैं जैसे सागर नदियों को अपने में समाहित कर लेता है (2.70), जहाँ हमारी प्रतिक्रियाएँ उन परिस्थितियों से अप्रभावित रहती हैं; वही वास्तविक मुक्ति है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण द्वाराबताए गए पड़ाव हमारी मुक्ति के मार्ग पर हुई प्रगति को परखने के मार्गदर्शक संकेतक बन सकते हैं।
Published: Mar 25, 2026Duration: 4m 19s
Season 4 - Episode 218
218. अहिंसा
श्रीकृष्ण कहते हैं, “अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, निन्दा न करना, सभी प्राणियों पर दया, लोभ से मुक्ति, नम्रता, विनयशीलता, स्थिरता ये सब दैवीय गुण हैं (16.2)। जबकि अहिंसा एक दिव्य गुण है, कुरुक्षेत्र का हिंसक युद्ध एक बड़ी बाधा है जिसे भगवद्गीता को समझने के लिए पार करने की आवश्यकताहै।सबसे पहले, इस विरोधाभास का उत्तर श्रीकृष्ण ने पहले ही दे दियाथा जब उन्होंने अर्जुन से कहा था कि यदि वह सुख-दुःख, लाभ-हानि और जीत-हार के बीच आंतरिक संतुलन बनाए रखते हुए युद्ध लड़ेगा तो उसे कोई पाप नहीं लगेगा (2.38)। यह आंतरिक संतुलन या समत्व, अहिंसा के अलावा और कुछ नहीं है। अक्रोध (क्रोध से मुक्ति), एक और दैवीय गुण है जो इस आंतरिक संतुलन का परिणाम है। दूसरी ओर, असंतुलन से उत्पन्न कोई भी कार्य हिंसा है।दूसरे, श्रीकृष्ण कहते हैं कि सर्वश्रेष्ठ योगी वह है जो दूसरों के प्रति सुख-दुःख में वैसा ही भाव रखता है जैसा वह स्वयं के लिए रखता है (6.32)। यह ईर्ष्या के बिना दूसरों के सुख को अपना सुख मानना है; यह परपीड़न या व्यंग्य के बिना दूसरों के दुःख को अपना दुःख मानना है। दूसरों के प्रति ऐसी भावना अहिंसा है। निंदा भी एक प्रकार की हिंसा है जो हम झूठे और अपमानजनक बयान देकर दूसरों पर करते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण ने निंदा न करने को एक दिव्य गुण के रूप में शामिल किया। त्याग का एक और दिव्य गुण घृणा का त्याग है (5.3)।श्रीकृष्ण ने पहले दूसरों को स्वयं में और स्वयं को दूसरों में देखने का मार्ग बताया था (6.29-6.30)। यह दर्शाता है कि हममें भी वे अवगुण हैं जिनकी हम दूसरों में आलोचना करते हैं और दूसरों में भी वे अच्छे गुण हैं जिनकी हम प्रशंसा करते हैं। इसे समझना ही सभी प्राणियों के प्रति करुणा और सौम्यता जैसे दिव्य गुणों को प्राप्त करना है।सत्य (सत्यवादिता) का अर्थ है अनुकूल और प्रतिकूल दोनों हीपरिस्थितियों में बिना किसी शर्त के सत्यवादी होना। यह गुण भी हमारेआंतरिक संतुलन की उपज है।
Published: Mar 23, 2026Duration: 3m 38s
Season 4 - Episode 216
216. भय से पार पाना
भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का शीर्षक ‘दैव-असुर सम्पद विभाग योग’ है। इसका अर्थ है दैवी और आसुरी स्वभावों के बीच के भेद को समझकर परमात्मा से एकत्व की प्राप्ति करना। हममें से प्रत्येक व्यक्ति में अनेक गुण होते हैं, जिन्हें दैव (दैवी) और असुर (आसुरी) कहा जा सकता है। दैव वह आंतरिक यात्रा है जो परमात्मा की ओर ले जाती है, जबकि असुर प्रवृत्ति हमें उनसे दूर ले जाती है। श्रीकृष्ण ने ‘अभयं’ (भय का आभाव) को दैवी गुणों में प्रथम बताया है (16.1)। यद्यपि अभयं का अर्थ सामान्यतः निर्भयता के रूप में किया जाताहै, किंतु उसका भावार्थ इससे कहीं अधिक गहन है।भगवद्गीता को समझने के लिए हमें हमेशा तीसरे विकल्प को ध्यान में रखना चाहिए। जैसे कि राग और विराग से परे की तीसरी अवस्था वीत-राग है। इसी तरह, आसक्ति और विरक्ति से परे की तीसरी अवस्था अनासक्ति है। हम आसक्ति/राग या विरक्ति/विराग के द्वंद्वों से भली-भाँति परिचित हैं, लेकिन तीसरी अवस्था तक पहुँचना एक चुनौती है। ऐसा ही 'अभय' भी है, जोभय और निर्भयता दोनों से परे है। जहाँ भय एक आंतरिक भावना की अभिव्यक्ति है, वहीं निर्भयता उस भावना का दमन हो सकता है, हालाँकि, अभय दोनों से परे है।सबसे पहले, मनचाहा फल न मिलने पर भय और क्रोध उत्पन्न होता है। अभय का अर्थ है कर्मफल का त्याग करके, जो भी परिणाम मिले उसे ईश्वर का आशीर्वाद मानकर स्वीकार करना (2.47), और सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय के बीच आंतरिक संतुलन बनाए रखना (2.38)।दूसरा, मृत्यु हमारा मूलभूत भय है जिसमें हमारी मान्यताओं, प्रतिमानों, अच्छे समय का अंत (मृत्यु) और हमारी संपत्ति की हानि (मृत्यु) भी शामिल है। अभय का अर्थ है 'अपनी मान्यताओं के विपरीत' के परिणामों को स्वीकार करना है, क्योंकि वे भी परमात्मा का ही अंश हैं। वास्तव में, कुछ संस्कृतियाँ अभय प्राप्त करने के साधन के रूप में मृत्यु के उपयोग को प्रोत्साहित करती हैं। श्रीकृष्ण ने परमात्मा की ओर यात्रा में अभय को पहली आवश्यकता के रूप मेंरखा है, क्योंकि सागर में नमक की गुड़िया के घुलने की तरह स्वयं को विलीनकरने के लिए, उनके भयंकर विश्वरूप का सामना करने के लिए, अभय आवश्यक है।
Published: Mar 20, 2026Duration: 4m 18s